धनबाद [विनय झा]। डब्लूडब्लूडब्लू.बीसीसीएल.सीएमपीडीआई.को.इन यह है विश्व की सबसे बड़ी कोल कंपनी कोल इंडिया की अनुषंगी इकाई भारत कोकिंग कोल लि. [बीसीसीएल] की विभागीय वेबसाइट का पता जो कि धनबाद कोयलांचल में कोयले के उत्खनन में लगी हुई है।
आप यदि आज और अभी इस वेबसाइट को खोलें तो पाएंगे पर्यावरण संरक्षण के कई बेमिसाल किस्से। यह कि कंपनी ने आखिर किस तरह इस कोयलांचल में पिछले सौ वर्षो से अधिक समय से खनन के दौरान आग-भूधंसान से बर्बाद हुई हजारों एकड़ जमीन के एक बड़े हिस्से का जैविक एवं भौतिक पुनरुद्धार करने में कामयाबी हासिल की है। जमीन के जैविक पुनरूद्धार की 'सफल कहानियों' में सबसे ऊपर स्थान दिया गया है जोगता अग्निक्षेत्र को।
बताया गया है कि किस तरह यहां मिट्टी की चादर बिछाकर तथा एक लाख से अधिक पेड़ लगाकर व तालाब खोद कर भीषण अग्नि लपटों पर काबू पाते हुए बर्बाद जमीन का पुनरुद्धार किया गया है। इसमें एक बड़े जतन से बनाए गए एक सुंदर हरित उद्यान का जिक्र है जिसमें सैकड़ों पेड़ों की हरियाली के बीच छोटे-छोटे वन्य पशु विचरण कर रहे हैं। अपनी खूबसूरती के चलते यह उद्यान पिकनिक स्पाट बन चुका है.. आदि.आदि। अब आइए, हकीकत से आपको रूबरू कराएं।
उपरोक्त दावे व सफलता की कहानी 23 जून की शाम तक का सच थी, आज 24 जून की नहीं। बीते बारह घंटे की रात में ही सारा नजारा बदल चुका है। जिस सुंदर उद्यान का जिक्र किया गया है उसका आज की तिथि में नामोनिशान नहीं है। वह इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका है। उद्यान का अस्तित्व सिर्फ कंपनी की वेबसाइट में है। कंपनी के आधा दर्जन बुलडोजर रात के अंधेरे में पूरे पार्क को निगल गए। जिंदा पेड़ कटकर जमीन पर धराशाई हैं।
कंपनी का कहना है कि अब यहां से बड़े पैमाने पर कोयला निकाला जाएगा। कंपनी की सेहत में सुधारने के लिए यह बहुत जरूरी है। ठीक बात है। मगर इसके साथ ही यहां के लोगों का सबसे बड़ा और सीधा सवाल यह है कि जब यही करना था तो बनाया ही क्यों गया?
भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार जोगता की अग्नि से निबटने व जमीन के जैविक पुनरु द्धार के लिए केंद्र सरकार की मदद से 11 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई थी। दस्तावेजों के अनुसार 1960 के दशक में यहां इतनी भीषण आग लगी हुई थी, जिसकी लपटें 60 फीट ऊंची थीं। यह आग तेजी से अगल-बगल के क्षेत्रों को आगोश में समेट रही थी। इसके साथ ही आस-पास की आबादी भी खतरे की जद में आ गई थी। पूरे इलाके में एक दूब तक नहीं थी। इससे निबटने के लिए वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों की मदद से एक विशेष जोगता फायर प्रोजेक्ट तैयार किया गया। 1979-81 के दौरान 40 हेक्टेयर अग्निक्षेत्र में 11 करोड़ रुपये खर्च कर जहां एक ओर मिट्टी की चादर फैलाकर आग का आक्सीजन से संपर्क काटा गया वहीं एक लाख 40 हजार पौधे लगाए गए, तालाब खुदवाया गया व 17 हेक्टेयर में हरित उद्यान बनाया गया। बाद के वर्षो में इसे बड़े जतन से संभाला व संवारा गया।
वर्षो की मेहनत से लाल-लाल अग्नि भूमि पर हरियाली की चादर फैल गई। पार्क में जहां हिरण थे वहीं तालाब में मछलियां। कई अन्य पौधे व जीव-जंतु भी प्राकृतिक रूप सेआकर्षित होकर विकसित होने जैव विविधता का सुंदर नजारा पैदा हो गया। आस-पास की हवा में अब प्रदूषण नहीं थी। धरती की आग भी धीरे-धीरे शांत हो रही थी। 1996 में विश्व बैंक की एक टीम ने इस क्षेत्र के सर्वे के बाद रिपोर्ट दी थी कि फायर प्रोजेक्ट से ऊपर की सतही आग तो ढंडी हो गई है मगर अंदर में अभी भी सोई हुई है। यदि कहीं से इसे आक्सीजन मिला तो यह फिर भड़क सकती है।
ताजा बीसीसीएल प्रबंधन ने अब इस इलाके में पेड़-पौधे काटकर आउटसोर्सिग से खुली [पोखरिया] खदान की ओर कदम बढ़ा दिया है। बताते हैं कि आउटसोर्सिग कंपनी को 28 हेक्टेयर जमीन दी गई है। पर्यावरण संरक्षण की वर्षो की मेहनत व राशि व्यर्थ हो चुकी है। आसपास के लोग भयभीत हैं कि खुली खदान के जरिए अगर एक बार अंदर की सोई हुई आग को छेड़ दिया गया तो वह इस कदर भड़क कर भीषण रूप ले लेगी कि आस-पास का पूरा इलाका एक बार फिर तबाही की जद में आ जाएगा।
Thursday, June 25, 2009
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