नई दिल्ली। ग्लोबल मंदी ने देश के दक्षिण एशियाई पड़ोसियों की हालत पतली कर दी है। इसके चलते पाकिस्तान समेत पड़ोसी देशों में विकास की धीमी रफ्तार से न केवल नौकरियों में कटौती जारी रहेगी, बल्कि लोगों की आमदनी में भी कमी आएगी। संयुक्त राष्ट्र 'सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य' रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है। आर्थिक संकट के माहौल में भी भारतीय अर्थव्यवस्था 6.7 फीसदी की अच्छी-खासी रफ्तार से दौड़ रही है। हालांकि यह पूर्व की 9 फीसदी वृद्धि दर के मुकाबले कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अन्य देशों के मुकाबले भारत में स्थिति बेहतर है और यहां लोगों की नौकरियां अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।
यह रिपोर्ट राजधानी में मंगलवार को जारी की गई। वर्ष 1999 से 2005 के बीच का हवाला देते हुए रिपोर्ट ने कहा है कि ग्लोबल मंदी व छंटनी की वजह से इस क्षेत्र में चलाए जा रहे गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम खतरे में पड़ते दिखाई दे रहे हैं। रिपोर्ट में इस सहस्त्राब्दि [मिलेनियम] के लक्ष्यों का वार्षिक लेखा-जोखा है। संयुक्त राष्ट्र ने 8 विकास लक्ष्य तय किए हैं। इन्हें वर्ष 2015 तक हासिल करना है।
रिपोर्ट के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थो के दामों में गिरावट आई है। इसके बावजूद भारत, ब्राजील, नाइजीरिया व चीन जैसे देशों में समाज के वंचित वर्गो के लिए खाद्य पदार्थो की उपलब्धता में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। अब भारत इस दिशा में खाद्य सुरक्षा कानून के रूप में पहल करने जा रहा है। सोमवार को पेश आम बजट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस कानून को बनाए जाने की प्रतिबद्धता जताई है। रिपोर्ट का कहना है कि लड़कियों की संख्या बढ़ने के बावजूद दक्षिण एशिया में महिलाओं को नौकरी के अवसर नहीं मिल पाते हैं। हालांकि इस मामले में भारत की स्थिति कुछ बेहतर है। इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के कंट्री डायरेक्टर डी. बोयड ने महिला सशक्तिकरण व गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उपलब्धियों के लिए भारत को सराहा है। उन्होंने कहा कि देश में स्थानीय तौर पर चुनी गई 10 लाख महिला प्रतिनिधि हैं। यह संख्या विश्व में कुल निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों से भी ज्यादा है।
Tuesday, July 7, 2009
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